दुनिया में अगर पूछा जाए कि इंसानी रिश्तों में सबसे पवित्र रिश्ता कौन सा होता है..? तो शायद मां-बेटे का रिश्ता ही सामने आएगा. ऐसे में अगर इस पवित्र रिश्ते को लेकर को कोई विवादित विचारधारा सामने आए, तो उसे क्या कहेंगे!
यह बात हैरान कर देने वाली है, लेकिन दुनिया में एक ऐसा इंसान भी हुआ, जिसने मां-बेटे और पिता-बेटी के बीच के रिश्तों को न सिर्फ कटघरे में खड़ा कर दिया, बल्कि इससे संबंधित एक विवादित सिद्धांत भी रच दिया. यह शख्स कोई और नहीं ‘सिगमंड फ्रायड‘ थे
प्रख्यात मनोविश्लेषक थे फ्रायड
6 मई 1856 को आस्ट्रिया के फरीबर्ग में पैदा हुए सिगमंड फ्रायड 4 साल की उम्र में अपने परिवार समेत विएना आ गए. यहां फ्रायड ने अपनी स्कूली शिक्षा हासिल करने के बाद साल 1881 में चिकित्सक की पढ़ाई पूरी की. एक मेडिकल छात्र के तौर पर फ्रायड ने न्यूरोबायोलॉजी पर अपनी रिसर्च शुरू की. अपने शुरुआती दिनों में सिगमंड अपने एक दोस्त और साथी सहभागी जोसफ बरेयूर के काम से काफी प्रभावित थे.
फ्रायड और जोसफ ने काफी समय तक एक साथ काम किया, लेकिन कुछ समय बाद जोसफ ने फ्रायड का साथ छोड़ दिया क्योंकि जोसफ ने पाया कि दिमागी रोगियों की जांच के दौरान फ्रायड मरीज के दिमाग में यौन उत्पति पर अधिक ध्यान दे रहे हैं.
इसके चलते जोसफ फ्रायड से अलग हो गए, लेकिन फ्रायड ने अपनी रिसर्च जारी रखी. देखते ही देखते वह एक विख्यात मनोविश्लेषक के रूप में प्रसिद्ध हो गए. उन्होंने अपने जीवन में कई सिद्धांतों व मनो-वैज्ञानिक तकनीकों का निर्माण किया.
इसी क्रम में 20वीं शताब्दी के दौरान उन्होंने ‘ईदिपस काम्प्लैक्स’ या ईदिपस मनोग्रंथि नामक एक सिद्धांत की रचना की, जो कि हैरान करने वाला था.
इस सिद्धांत के तहत सिगमंड ने एक बच्चे की आंतरिक इच्छाओं की विवेचना की. उन्होंने बताया कि एक लड़के के मन में हमेशा अपनी मां को पाने का भाव रहता है, जबकि अपने पिता के प्रति क्रोध की भावना रहती है.
इसी तरह एक लड़की अपने पिता के प्रति यह भावना रखती है और अपनी मां को अपना प्रतिद्वंद्वी मानती है. यही नहीं फ्रायड के मुताबिक एक नियमित आयु तक बच्चे को उसके समान लिंग के माता-पिता दुश्मन प्रतीत होते हैं. जबकि, विपरीत लिंग के प्रति उसमे प्यार और संवेदनशीलता होती है
मगर फ्रायड ने अपने सिद्धांत को सही सिद्ध करने के लिए पर्याप्त प्रमाण दिए हैं, कि आखिर ये भावना क्यों और कैसे पैदा होती है. साथ ही, उन्होंने इसे ठीक करने के तरीके भी बताए हैं.
क्या कहती है ग्रीक की पौराणिक कथा…
फ्रायड के इस पेचिदा सिद्धांत ने सभी लोगों में उनके प्रति क्रोध पैदा कर दिया, लेकिन वह अपने सिद्धांत पर पूरी तरह अटल रहे.
फ्रायड ने अपने इस सिद्धांत को सबसे पहले 1899 में अपनी किताब ‘दी इंटरप्रिटेशन ऑफ ड्रिम’ के जरिए दुनिया के सामने पेश किया. हालांकि, उस समय फ्रायड ने इस सिद्धांत के लिए ‘ईदिपस कॉम्प्लैक्स’ शब्द का इस्तेमाल नहीं किया था.
इस सिद्धांत को यह नाम सन 1910 में मिला.
फ्रायड ने अपने इस सिद्धांत को ज्यादा अच्छे से समझाने के लिए उदाहरण स्वरूप ग्रीक माइथोलॉजी के एक प्राचीन पात्र ईदिपस रेक्स को लिया. ईदिपस से जुड़ी कहानी के अनुसार उसने अपने पिता की हत्या कर अपनी ही मां से शादी कर ली थी.
फ्रायड ने अपने इस सिद्धांत में इस उदाहरण को लेकर यह सिद्ध करना चाहा कि आखिर कैसे एक बच्चे के दिल में अपने विपरीत लिंग माता-पिता के प्रति-प्रेम की भावना बनी रहती है, जबकि समान के प्रति घृणा और क्रोध!
ईदिपस काम्प्लैक्स पैदा होने के संकेत!
सिगमंड फ्रायड ने बच्चों में किसी भी प्रकार की मानसिक कमजोरी और साइकोन्यूरोसिस का मूल कारण ईदिपस ग्रंथि को ही माना. एक वस्तु के प्रति प्रेम और नफरत के दो अलग-अलग भावों के होने का कारण भी इन्होंने ‘ईदिपस ग्रंथि’ को ही माना है.
फ्रायड का कहना था कि ईदिपस काम्प्लैक्स एक मनोस्थिति है, जो सभी बच्चों में पैदा होती है. लेकिन आप उसके ऊपर किस तरह से नियंत्रण कर पाते हैं, या फिर आप इसके गुलाम बनना चाहते हैं, ये आपके ऊपर निर्भर करता है.
उन्होंने इस मनोस्थिति की पहचानने के लिए बच्चों में पैदा होने वाली कुछ आदतों का जिक्र भी किया है. फ्रायड के मुताबिक जन्म के 18 महीनों के भीतर बच्चे में इसके लक्षण दिखाई देने लगते हैं, स्तनपान के दौरान बच्चे द्वारा ज्यादा समय तक स्तनपान करते रहना भी इसका एक संकेत है.
3 से 6 साल की आयु के दौरान बच्चे में अक्सर अपनी माता के प्रति अधिक संवेदनशीलता उत्पन्न हो जाती है. उदाहरण के लिए अक्सर देखा जाता है कि पिता द्वारा जब भी माता को गले लगाया या चूमा जाता है तो बच्चे उसे पसंद नहीं करते.
हालांकि आमतौर पर इसे एक आम स्वभाव माना जाता है, लेकिन फ्रायड के सिद्धांत के मुताबिक यह ईदिपस काम्प्लैक्स का ही एक संकेत है.
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